काल- साहित्यालोचन २५० वस्तु के संकलन के उपरांत काल या समय का संकलम आता है। काल-संकलन का यदि बिलकुल ठीक ठीक अर्थ लिया जाय तो यहाँ सिद्धांत निकलता है कि जो कृत्य संकलन वास्तव में जितने समय में हुआ हो, उसका अभिनय भी उतने ही समय में होना चाहिए। इस नियम का आपने वास्तविक अर्थ में पालन प्राचीन यूनानियों के नाटकों को हो शोभा देता होगा, पर और कभी या कहीं यह अभीट नहीं हो सकता । प्राचीन यूनानी नाटक दिनविन और रात रात भर होते रहते थे, इसलिये यूनान के सुप्रसिद्ध तत्ववेत्सा अरिस्टस्टल में यह नियम बना दिया था कि एक दिन और रात अर्थात् चौबीस घंटों में ओ जो काय हुष अथवा हो सकते हो, जहाँका समाबेश एक अभिनय में होना चाहिए । पोले सं एक फ्रांसीसी नाटककार ने यह नियम बना दिया कि चोवीख नहीं परिक तीस घंटों में जो जो कृत्य हो सकते अथदा हुए हो, उन्हांका समावेश पर नाटक में होना चाहिए । पा साधारणतः माटक प्रायः सोन चार घंटे में ही पूरे हो जाते हैं. इसलिये यदि चौवीस या तीस घंटी का काम तीन चार घटी में कर दिखलाया जाय, तो उसे भी काल-संकलम नहीं कह सकते । और यदि तीन चार घंटों के अंदर चौवीस या त्रीस घंटों के कृत्य दिखलाने में काल-संकलन का पालन हो सकता है. तो फिर साल छः महीने का कृत्य विस्खलाने में वह क्यों बाधक होता है ? इससे सिंह है कि संकलन का यह नियम यूनानी नाटकों की बिल-
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