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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२७२

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२५१ दृश्य-काष्य का विवेचन फुल आरंभिक अवस्था में पना था और पीछे से उन लोगों ने बिना समझे चूमे उसका पालन किया था। पर जय प्रश्न यह होता है कि माइकरचना में काळ या समय के संकलन का कहाँ तक और किस रूप में ध्यान रखना चाहिए। हमारी समझ में नाटक की घटनाएँ चाहे एक दिन की हो, चाहे एक सप्ताह की हो, चाहे एक मास की हो, चाहे एक घर्य की ही और चाहे इससे भी अधिक समय की छो, काल-संकलन को उसमें कभी बाधक न होना चाहिए। यदि काल-संकलन का यूनानी या फ्रांसीसी अर्थ लिया जाय तो फिर आजकल को इष्टि से किसी अच्छे नाटक की रचना हो ही नहीं सकती। हाँ, इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए की नाओं का क्रम बिलकुल ठीक हो, पीछे होनेवाली घटनाओं का उल्लेख पहले होनेवाली घटनाओं या दृश्यों के पीछे न हो। दूसरी यात यह है कि दो घटनाओं के मोच में जो समय पास्तव में योता हो, उस पर दर्शको का ध्यान न जाने पाये। मान लीजिए कि पहले अंक के पहले रश्य में जो घटना दिसलाई गई है, नाटक- कार. उसके दो चार महीने पोले की कोई घटमा विखखाना चाहता है। उस दशा में उसे वह पिछली बटना तुरंत दूसरे हो रश्य मैं न दिखलानी साहिए, बल्कि योच में वो एक और. रश्य रसकर तब दिखलामी चाहिए, और इन दोनों घटनाओं या दृश्यों के बीच में या तो चोच की कुछ घटनाएँ दिखलानी चाहिएं या और कोई प्रासंगिक कथावस्तु ला रखनी चाहिय ।