स्थल- २५५ दृश्य-काश्य का विवेचन अंक में नायक की कोना वस पट्रो की होनी चाहिए । इन नियमों से सिद्ध होता है कि भारतीय नाटकों में औरों की अपेक्षा कारल-संकलन का ध्यान बहुत अधिक और अच्छे ढंग से रखा जाता था। अब तीसरासंफलम स्थल या देश का है । यूनानियों के स्थल- संकलम का अर्थ यह है कि रंगशाला का रश्य आदि से अंत सक एक ही रहना चाहिए । अर्थात् नाटक को रचना संगठन पे.सी होनी चाहिए जो एक हीस्थान में, एक हो रश्य में दिखलाई जा सके। अभिनय के बीच में रंगभूमि के रश्य में इस नियम के अनुसार किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हो सकता । युनानियों ने यह नियम इसलिय बनाया था कि उनके नाटकों के गानेवाले आदि से अंत तक रंगभूमि पर ही उपस्थित रहते थे और बीच बीच में आवश्यकता पड़ने पर गान लग जाते थे। उनमें अंक और गर्भाक आदि तो होते ही नथे, इसलिये नाटक के बीच में कहीं विक्षाम भी न होना था। जितनी देर तक गानेवाले गीत गाते रहते थे, उतनी देर तक दर्शकों के लिये एक प्रकार से विधाम हो जाता था. पर रंगशाला में किसी प्रकार का परिचर्तन नहीं हो सकता था। इसके अतिरिक्त उनके नाटकों की रचना भी इसमी सादी और साधारण होती थी कि उन्हें स्थल के रश्य में विशेष परिवर्तन की आवश्यकता ही न होती थी। और यदि किसी अच्छे नाटककार को कभी नाटक का सौंदर्य बढ़ाने के लिये दृश्य-
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