साहित्यालोचन २५६ परिवर्तन की आवश्यकता भी पड़ती थी, तो यह संकलनबाले इस नियम का पालन करने के लिये उसे बचा जाता था। नाटकों में अनेक ऐसे प्रयोग होते है जो उनके कर्ता पात्रों के अतिरिक दूसरे पात्रों के सामने नहीं होने चाहिएँ । पर यूनानी माटको में ऐसे प्रयोग भी सभी पात्रों के सामने छुआ करते थे। यह व्यवस्था कला की रधि से दूषित और साथ ही नाटक के तत्वों का ध्यान रखते हुए बहुत कुछ अस्वाभाविक थी, इसी लिये हमारे यहाँ इसका ग्रहण नहीं दुभा । इन्हीं सब बातों का विचार करते हुए अनेक विशनों का यह मत है कि यूनानियों या लैटिनों आदि की अपेक्षा हिंदुओं की सृष्टि-सौंदर्य की कल्पना अधिक ललिस और वर्णन अधिक सजीय होता है। उपन्यासों और नाटकों के पाँच तत्वलो पर अलग नवे अध्याय में विचार किया गया है, इसलिय न तो हमने गद्य-काध्य के विषचन में ही उस पर विचार किया है उग्य और न दृश्य काव्य के विवेचन में उस पर विचार करने की आवश्यकता है। इसखिये अब हम नाटक के छठे नत्व उद्देश्य को लेते हैं। उपन्यास की भाँति नाटक के उद्देश्य से भी हमारा सान्पर्य जोवन की व्याख्या अथवा आलोचना से है। इस संबंध में गन काग्य के विवेचन में हम जो कुछ कह आए हैं, उसे यहाँ दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। वहाँ उपन्यास के उद्देश्य के संबंध में जो कुछ कहा जा चुका है, वही नाटकों के संबंध में भी अक्षरशः ठीक
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