कन्या का विवेचन कर्णेद्रिय हैं। (३) ये आधार और उपकरण केवल एक प्रकार के मध्यस्थ का काम देते है जिनके द्वारा कला के उत्पादक का मग देखने या सुननेवाले के मन से संबंध स्थापित करता और अपने भाची को उस तक पहुँचाकर उसे प्रभावित करता है। अर्थात् सुनने या देझनेवाले का मन अपने मन के सहश कर देता है। अतएच यह सिद्धांत निकला कि लक्षित कला बह वस्तु या यह कारीगरी है जिसका अनुभव इंद्रियों की मध्यस्थता द्वारा मन को होता है और जो उन बाह्याथों से मिल है जिनका प्रत्यक्ष मान दियाँ प्राप्त करती हैं। इसलिये हम कह सकते हैं कि ललित कलाएँ पानसिक दृष्टि में सौंदर्य का प्रत्यक्षी- करण है। इस लक्षण को समझने के लिये यह आवश्यक है कि इम प्रत्येक मलित कला के संरंध में नीचे लिखी तीन बातों पर विचार करें-(१) उनका मूर्त आधार, (२) यह साधन जिसके द्वारा यह आधार गोपर होता है; और (३) मानसिक रष्टि में नित्य पदार्थ का जो प्रत्यक्षीकरण होता है, वह कैसा और फितना है।। वास्तु-कला में मृत आधार निकृष्ट होता है अर्थात् र, परवर, मोहा, लकड़ी आदि जिमसे मारतं धमाई जाती है। ये सच पदार्य मूर्त है, अतएव इनका प्रभाव माह वास्तुकला पर पैसा ही पड़ता है जैसा कि किसी दूसरे मूर्त पदार्थ का पड़ सकता है। प्रकाश, छाया, रंग, प्राकृतिक स्थिति मादि साधन कला के सभी उत्पादकों को उप-
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