२६१ श्य-काव्य का विवेचन नीसिमक्षा बढ़े, उसमें उत्तमतापूर्वक जीवन निर्वाह करने को योग्यसा आये और उसका आचरम मुघरे। नाटकों का ठीक ठीक विवेचन करने के लिये सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि नाटक के मूल सिद्धांत क्या हैं। बहुधा आधुनिक नाटकीय कहानियों का मूल भाटक-पना के तत्व किसी न किसी प्रकार का विरोध हुआ सियांत करता है। नाटक में वो विरोधी भान, पक्ष, सिद्धांत या दल आदि दिखलाए, जाते हैं और उन्हीं दोनों के विरोध के साथ साथ कथावस्तु का विकास होता चलता है। साधारण नाटका में यह विरोध प्रायः व्यकिगत रूप में ही सामने आता है। किसी महात्मा और दुरात्मा या किसी सचे वीर और दुष्प बलवान् का विरोध और अंत में उस महात्मा था धीर आदि की विजय का दृश्यही अधिकार नाटकों में दिखाया जाता है। पर अच्छे नाटकों में यह विरोध और भी अनेक रूपों में दिमाखाया जा सकता है। किसी कोर को अपने दुर्भाग्य अथवा विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं और किसी विचारपान को स्वयं अपने ही तामस भावो का दमन करना पड़ता है। तात्पर्य यह कि प्रायः किसी न किसी प्रकार का विरोध या विपरीतता ही मादक का मूल आधार होती है। नाटक में जहाँ से यह विरोध या संघर्ष आरंभ होता है. मानी वहीं से मुख्य कथावस्तु का भी आरंभ होता है, और जहाँ इस विरोध या संघर्ष का कोई परिणाम निकलता
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