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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२८४

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२६३ श्य-काव्य का विवेचन प्रत्यक्ष नहीं थे कि रंगशालाओं पर उनके अभिमय की आवश्यकता होती। हमारे यहाँ के प्राचीन नाटक तो फेवल धर्म, अर्थ और काम को सिशि के उद्देश्य से रचे, खेले और देखें आते थे। इसलिये हमारे यहाँ कथावस्तु के विभाग भी कुछ और ही ढंग से किए गए हैं। हमारे यहाँ भी कथावस्तु या रूपक के आरम्भ, यक, प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फखागम ये पाँच ही विभाग किए गए हैं। इन पाँची विभागों को ऊपर बतलाए हुए पाँचों विभागों के साथ तुलना को जा सकती है और दोनों में कुछ सामंजस्य भी स्थापित किया जा सकता है। हमारे यहाँ के आचार्यों के अनुसार किसी प्रकार का फल प्राप्त करने की उत्कठा होती है और उसी उत्कंठा से नाटक का आरम्भ होता है । उस फल की प्रामि के लिये जो व्यापार होता है, वह यस कहलाता है। आगे चलकर उस फल को प्राप्ति की आशा होगे लमनी है जिसे प्राप्त्याशा कहते हैं। इसके उपरांत चित्रों का नाश हो जाता है और फल की प्राप्ति निश्चित हो जाती है, जिसे नियतान्ति कहते हैं। ओर सबके अंत में कल-मानि होती है, जो फलागम कहलाती है। इससे सिद्ध है कि हमारे यहाँ के नाटकों में विरोध भाष को कभी श्यानता नहीं की जाती थी और उनमें केवल उद्योग और सफलता का ही महत्त्व प्रतिपादित होना था। तो भी यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो इम दोनों प्रकार के विभागों में, इस विरोधकाले तत्व को छोड़- कर, और कोई विशेष अंतर नहीं है। आरंभ और अंत अथवा