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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२८५

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साहित्यालोचन २६४ फखागम के सम्बन्ध में तो कुछ कहना ही नहीं है। शेष बीच की तीनो अवस्थाओं में भी कोई विशेष अन्तर नहीं है। एक में भगड़े का विकास होता है, दूसरे में फल-सिद्धि के लिये यन होता है। एक मै विजय का निधय आरम्म होने लगता है और दूसरे में फल-माप्ति का एक में विजय निश्चित होती है और दूसरे में फल प्राप्ति । यदि दोनों में कोई मुस्प अन्तर है नो यह यह कि पाश्चात्य विद्वानों ने विरोध या संघर्ष को प्रधानता देकर अपने विषय की सीमा बहुन संकृषित कर दी है। और हमारे यहाँ के आचार्यों ने अपना क्षेत्र थयुग विस्तृत रजा है। हमारे विभाग और विवेचन के अन्तर्गत उनके विभाग और उनका विवेचन सहज में आ सकता है: पर उनके संकुचित विवेचन में हमारे विस्तृत विवेचन के सिय स्थान नहीं है। अस्तु: अब हम इन दोनी प्रकार के विभागों आदि का भ्यान रखते हुए यह बतलाना है कि नाटक का आगंभ, बीच की नीनों अवस्थाओं से उनका निर्वाह और फिर कथानम् उसका अंत किस प्रकार करना पाहिए । पाश्चात्य विद्वानों ने अपने हामी पाँची यिमाणो के कारण यह नियम रखा है कि नारक में पाँच अंक हो: और एक एक अङ्क में कम से इन पाँचों में की एक एक बात आती चतं । इसका नात्पर्य यह है कि होइन पाँची विभागों से परिचित हो, यह सहज में नाटक की सब बातें समझता चले। हमारे यहाँ भी साधारणतः नाटक के पाँच ही अफ रखे गए हैं। हमारे यहाँ