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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२९

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c साहित्यालोचन लब्ध रहते हैं। उनका उपयोग सुगमता से करके आँखों के द्वारा दर्शक के मन पर अपनी कृति की छाप डाल सकते हैं। इसके दो कारण है -एक तो उन्हें जीवित पदार्थों की गति आदि प्रदर्शित करने की आवश्यकता नहीं होती। दूसरे उनकी कृति में रूप, रंग, आकार आदि के ये ही गुण वर्धमान बहते हैं जो अन्य निजीष पदार्थों में रहते हैं। यह सब होने पर भी जो कुछ घे प्रदर्शित करते हैं, उनमै स्वाभाषिक अनुरूपता होने पर मो मानसिक भावों की प्रतिछाया प्रस्तुन रहती है। किसी इमारत को देखकर समान जन सुगमता से कह सकते हैं कि यह मंदिर. मसजिद या गिर्जा है अथषा यह महल या मकबरा है। विशेषज्ञ यह भी बता सकते हैं कि इसमें हिंकू, मुसलमान अथवा यूनानी वास्तु-कला की प्रधानता है। धर्मस्थानों में भिन्न मिष जातियों के धार्मिक विचारों के अनुकूल उनके धार्मिक विश्वासों के निवर्शक करवश, गुंबद, मिहराये, जालियाँ, अरोग्ये आदि बनाकर वास्तुकार अपने मानसिक भावों को स्पष्ट कर दिखाता है। यही उसके मानसिक भावों का प्रत्यक्षीकरण है। परंतु इस कला में मूर्त पदार्थों का इतना वाहूल्य रहता है कि दर्शक. उन्हों को प्रत्यक्ष वेसकर प्रभावित और आनंदित होता है, चाहे वे पदार्थ वास्तुकार के मानसिक भावों के यथार्थ निवर्शक हाँ चाहे न हो अथवा दर्शक उनके समझने में समर्थ हो या न हो। भूर्ति-कला में मूर्त आधार पत्थर, धातु, मिट्टी या लकड़ा