साहित्यालोचन २५८ मनोविज्ञान में बुद्धि को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है। मानसिक कामों में इसकी प्रधानता रहती है। हमारे यहाँ इसे अंतःकरण की निश्चयात्मिका बृत्ति माना है। इसे हम मन मुद्धि की चेतन शक्ति भी कह सकते है। इसी की सहायता से सष प्रकार के इंद्रिय-शान या मनाचेगादि का बोध होता है। जब हमें किसी वस्तु का ज्ञान होता है, नव भुपि के हो द्वारा उसके संबंध के विचारों की उत्पत्ति होती है। दार्शनिकों ने विचार के दो अर्भलिए हैं। पहला अर्थ तो उन सब मानसिक स्थितियों का है जिनका बुद्धि द्वारा अंनाच या शान होता है। इस अर्थ के अनुसार विचार में मनोराग: संकल्प. च्छा आदि सब का समावेश हो जाता है। दुसरा अर्थ शब्द का यह रूप है जो चाणी द्वारा प्रकाशित किया जाता है। कुछ लोग विचार से जुन्द्रि के उस कार्य का अर्थ लेते हैं जो कल्पना द्वारा होता है। साहित्य-शारण के लिये इन विचारों को आवश्यकता नहीं है। हमारे लिये तो इतना ही जान लेना बहुत है कि जब हमारा मन बुजि द्वारा किसी ज्ञान को प्राप्त कर लेना है, तब उसके संबंध में अनेक प्रकार के गार हमारे मन में अभिव्यक्त होत है। जब हम किसी नही नालाय. पेड़-फूल, घर-दुकान, स्त्री-पुरुष आदि को नषत है. तर भिन्न भिन्न मानसिक फियाओं के कारण हमारे मन में कुछ भाव अभिव्यक्त होते है। इन्ही मानसिक भाषी का नाम विचार है। जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, प्रत्येक लेखक या कवि अपने विषय के प्रतिपादन में कुछ
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