रसो का विवेचन विचारों का प्रयोग करता है और उन्हें अपनी कृति में अभिन्यक करता है। विचारों की उत्तमता के विषय में कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है: पयोकि यदि यह गुण किसी काव्य में न हो तो वह निकष्ट, निरुपयोगी और हानिकारक हो जाता है। अतएष घिमारों की श्रेष्ठता ध्यान देने योग्य है। कवि या लेखक को इनके द्वारा समाज का हित करने की ओर सदा वसचिन रहना माहिए। पर यह तभी संभव है जब वह स्वयं परिमार्जित, संस्कृत और उस पिचारों का केंद्र हो और अपने पाठकों के मन में उन विचारों का संचार करके उन्हें उस भाचों से परिपूर्ण तथा उसके कारण आनंदित कर सके । काम्य में बुद्धि-तत्व का यही उद्देश्य है और इसी को काव्य में सुचारु रूप से सुध्ययस्थित करने में कवि या लेखक का कौशल तथा उसकी महप्ता अभिव्यक्त होती है। काव्य का दूसरा तत्व कल्पना है । दार्शनिकों ने सब प्रकार के शान की पाँच अवस्थाएँ मानी है-परिशान, स्मरण, फरपना, विचार और सहत मान । सबसे पहले हमें बाह्य पायों का मान अपनी भाट्रियों अर्थात् आँख, कान, नाक, जिला और त्वचा से होता है। जब हम किसी मनुष्य के सामने जाते हैं, तब हमारे नेत्रों के द्वारा इस मनुष्य का प्रतिबिंब हमारे मन पर पड़ता है। जब तक हम उस मनुष्य को देखते हैं, तब तक वह प्रतिबिंब स्पष्ट रहता है, परन्तु जब हम नेत्र पंद कर लेते हैं, तब वह प्रतिषिय विलीन हो जाता कापनातन्त्र
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