२८१ रसो का विवेचन की एक विशेष क्रिया से स्मरणशकि द्वारा संचित अधुभवों को विभक्त कर और फिर उनके पुथक् पृथक् भागों को इलाहा- नुसार बोड़कर हमने मन में एक नवीन व्यक्ति की रचना कर भी जिसका अस्तित्व पाय जगत में नहीं है, परंतु जिसका चाय अगत् से स्वतंत्र चित्र हमारे मन में रहता है। मन की इस मिया को "कल्पना" कहत है। जो उदाहरण हमने दिया है, वह साधारण कल्पना का है। उसके आगे उस कल्पना का प्रादुर्भाव होता है जिसे 'मन की तरंग' कइसे हैं। मनोरागों का अस्तित्व भी उसका प्रधान लक्षण है। इन्ही रागों के द्वारा यह कल्पना उत्तेजित होती है और काय्यो सारा आनंद कर उद्रेक करने में सहायक यनती है। जब यह कल्पना और उत्तेजित हो जाती है, न वह अपनी बिलकुल नई सृष्टि खड़ी करने में भी समर्थ होती है। यह कल्पना शक्ति की पराकाष्ठा है। इसी की सहायता से बड़े बड़े काव्य रचने में प्रतिभाशाली कोखक और कवि समर्थ होते हैं। विधायक कल्पना ही संसार मैना, नए वैज्ञानिक आधिकारों को संभव कर दिखाती है और संसार का ज्ञान बढ़ाती है। कल्पना का आनंद दो प्रकार का होता है। एक तो यह आमंद है जो पदार्थों के वास्तविक अवलोकन तथा निरीक्षण द्वारा प्राप्त होता है। जब हम किसी वुख हुए समतल मैदान, विस्तृत रेगिस्तान, आकाशचंधित पर्वतमाला, ऊँची ऊँची बहाना, विपुल अलपशि आदि को देखते हैं, तब हमारे मन में
पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३०२
दिखावट