२८७ रसो का विवेचन व्यक्ति होती है। सब घस्तुओं की कोई न कोई निर्धारित सीमा होनी है। इसी प्रकार दियशान की भी सीमा समममी माहिए । अपने वेग के सीमा से अधिक या कम हो जाने के कारण वे दुःसा वायी प्रतीत होने लगते हैं। जब वे अपनी सीमा में रहते हैं, तभो उमका अनुभव मुसकर होता है। सूर्य का अधिष प्रकाश नेत्रों को तुःखदायी होता है। इसी प्रकार यदुत ही सूक्ष्म प्रकाश भी दुःसवायी होता है, परन्तु बगैच का या सम प्रकाश मन को मुम्न देनेवाला होता है। बड़े जोर की विवाहट अथवा बहुत धीमी चड़बड़ाहट कानी को कपकर होती है। परंतु साधारण स्वर से उचरित वाणी प्यारी लगती है। इसका कारण यही है कि या तो स्यर अथवा प्रकाश के अधिक तीव होने के कारण इंद्रियों को उसे ग्रहण करने में विशेष कम होता है, अथवा अन्यंत मृत्य होने के कारण उनको अहम करने में सामथ्र्य से अत्रिक प्रयत्न करना पड़ता है। इन दोनों के बीच की अधमधा अथवा सम भाव होने से इंद्रियाँ उसे सहल में ग्रहण कर लेती है। यही कारण है कि कर्णेदिय के द्वारा मन को ताल तथा लय युक्त गान से विशेष भरनन्द प्राप्त होता है। इसके साथ ही किसी भाव का अधिक समय तक मन में स्थिर रहना अथवा बहुत शीघ्रता से निकल जाना भी बुग्वदायी होता है। जब तक मम किसी भाव में तल्लीन रहता है, तभी तक वह सुखदायी रहता है। इसका कारण यह है कि किसी भाव के बहुत थोड़ी देर तक मन में रहने से उसमें
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