साविल्याखोचन २८८ परिपकता नहीं आती और बहुत देर तक रहने से उससे जो ऊब जाता है। यह तो स्पष्ट ही है कि खान से भाव्य की उत्पत्ति होती है। परंतु ये भाष, जिगका हम वर्सन कर रहे हैं और जिन्हें हमारे प्रथम श्रेणी में गिना है, इंद्रियों द्वारा प्राप्त शान से उत्पन्न होते हैं। इसी लिये इन्हें इंत्रिय-जनित भाष कहते हैं। जीभ द्वारा किती घादिष्ट भोजन के आस्यादन से हमें आनंद होता है और किसी दुरे स्वादवाले भोजन के चखने से दुःख होता है। शरीर के किसी अंग में कष्ट पहुँचने से आलस्य होता है, उसमें व्याधि होने से चिंता होती है। इसी प्रकार इंद्रियों द्वारा केंपल हर्ष, विषाद, आलस्य, विता इत्यादि हो नहीं बलि शोफ, भय आदि भाव भी अभिव्यक्त होते हैं। दूसरे प्रकार के माय वे हैं जो मन को भान तथा अनुभव प्राप्त करनेवाली शक्ति से संबंध रखते हैं। इंद्रिय-जनित भावों और इन भावों में यह अंतर है कि वे सीधे इंद्रिय- धान से प्रात होते हैं, और ये भूत, भविष्य और वर्तमान अनुभवों द्वारा उन इंद्रिय-जनित भाषों को विशेष रूप से पुष्ट करते हैं। मान लीजिए कि किसी प्रकार हमारा हाथ कट गया। अब हाथ कटने का कष्ट तो इम अवश्य अनुभव करेंगे, क्योंकि वह रहिय-जनित शारीरिक कष्ट है और अवश्यंभावी है। पर उस समय इस कष्ट की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है जब हम इस बात का विचार करते हैं कि
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