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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३११

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साहित्यासोचत २९० वासियत होती है। साधारणतः ये सब माय संचारी या व्यभिचारी भाषा के समान होते हैं। पर कभी कभी ये स्थायी भाष का रूप भी धारण कर लेते हैं। यदि हमें कोई अनुभव ऐसा हो रहा हो जिससे हमारे मन में इस बात का विचार उत्पन्न हो कि जो कार्य हमारे सामने है, उसको पूरा करने की शारीरिक शकि हममें नहीं है, तो भय रुप स्थायी भाव को उत्पत्ति हो जाती है। हम कह चुके है कि भविष्य से संबंध रखनेवाले अनुभवों के द्वारा भी भाय अभिव्यक्त होते हैं। भविष्य में क्या होमवाला है. इस विचार से उत्पन्न भाष औरमुफ्य कहलाता है। साहस एक ऐसा भाव है जिसके द्वारा मनुष्य भानेवाली आपत्तियों का सामना करने में अपने को समर्थ समझ लेता है। इसी प्रकार भविष्य से संबंध रखनेवाले विचारों से चिता, निराशा आदि अनेक संचारी भायों की अभिव्यक्ति होती है। सारांश यह है कि दूसरी श्रेणी के भाव, जिन्हें प्रमात्मक भाव करते हैं. ऐसे होते हैं जो मन को भान स्था अनुभव प्राप्त करनेवाखी शक्तियों से संबंध रखते हैं और भून, भविष्य तथा वर्तमान अनुभवों के द्वारा इंद्रिय जनित भाषा को परिपुष्ट करते हैं। साधारणतः इन्हीं गायों को साहित्य में संचारी भाव कहते हैं। कभी कमी अनुकूल स्थिति पाकर ये स्थायी भाष का प भी धारण कर लेते हैं। मनुष्य की अंतरात्मा की वृत्ति सदा कोई कार्य करने की ओर अमर होती है। इन कार्यों में कमी सो मनुष्य सफल-मनोरथ होता है