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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३२२

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रसो का विवेचन है,शो फिर रति विश्वक मामय की प्राप्नि मी कैसे मामी का सकती १ सौ में साँप का भ्रांतिभूलक शाम होने पर भी शारीर में ऊपरी क्षे जाती है। इस दशा में केबस यही कक्षा जा सकता है कि काम्य तथा अभिनय म्यापार में यही विशेषता है कि उससे आमार तो होता है, परंतु पुल नहीं होता। यदि किसी को आनंद के साश दुःख भी अनुभव होता हो तो उसको फिर किसी प्रकार की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है। अब पवि यह माम लिया जाय कि काव्य या मभिगय म्यापार में मायक-नायकांतर्गत शोक भी सहदय पाठकों या दर्शकों में हो जाता है, तो फिर वे काम्य क्यों पढ़ते और नाटक क्यों देखते मैं इसका उत्तर यही दिया जा सकता है कि यद्यपि रोटरी खाने में हाथ हिलाना पड़ता है, पर फिर भी लोग रोटी खाते क्योंकि हाथ हिलाने में जो कष्ट होता है, उसकी अपेक्षा भूमा की शांति में अधिक आमंद है। इसी प्रकार काम रस- प्रधान कार में अनिए माग की अपेक्षा इष्ट भाग के अधिक होने से लोग उसे पढ़ने या देखने में प्रवृत्त होते हैं। यो सोग करुण रस में भी आनंद ही मानते हैं, उनको यह समझना साहिए कि यदि रसत्र अभिनव या काव्य-व्यापार से रो पड़ते है, तो इसका कारण कष्ट मा दुम्सा नहीं होता, पल्कि एक प्रकार का मानंद हो होता है। बहुत दिनों के बिखरे हुए भाई अब मिलते हैं, तब चे प्रायः यसे सगकर रो पड़ते हैं। तो क्या महमा आब कि हमको मिसाप के कारण हुश्मा माहै।