सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३२४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

01 रनों का विषय देखते हैं, तो धमका रस का संचार हो जाता है। सारांश यह कि काब्य पा समिमय-व्यापार में देखने या पढ़नेवाला को जो अनिर्वचनीय सोकोत्तर आनंद प्राप्त होता है, उसको साहित्य शास्त्र में रस कहते हैं। यह रस भाष, विभाव, अनु- भाय और संचारी भावो के संयोग से परिपकता को प्राप्त होता है अथषा यो कह सकते हैं कि स्थायी भायों की परिपा- कायस्था का नाम ही रस है। भायों के विषय में हम विशेष रूप से सिम्ब चुके है। मत- एक उनके विषय मै यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। काव्य या अभिनय में आदि से अंत तक स्थिर रहने स्पायी के कारण भावों को स्थायी भाव कहा गया है। यह प्रश्न उठ सकता है कि भाच सो क्षण क्षण में पदसते रहते हैं। फिर उममें स्थिरता कहाँ से आ सकती है? यदि यह उपार दिया जाय कि सब भाष संस्कार रूप से स्थिर रहते है और विभाष आदि से अभिव्यक होते हैं, तो यह कहा जा सकता है कि इस अवस्था में रति से भिन्न कोरं दूसरा व्यभिचारी भाष भी यहाँ पर क्यों स्थिर नहीं हो सकतरयदि हो सकता है तो फिर व्यभिचारी भाव और स्थायी भाव में भेव ही क्या रहा। इसका उत्तर यह है कि जब एक ही भार वारंवार अभिव्यक्त होता है और दूसरे भाव उसे पुष्ट करते हैं, तमी वह वास्तव में स्थायी भाव कहा जाता है। दूसरे भाव सो बिजली की पाक के समान उत्पन्न होते मोर स्थायी भाष