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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३२६

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Bau चन महींपरिक अनिवार्य था कि ये रसो में खोट रख की और स्थायी भावों में निद को स्थान | सका कहना था कि जो नट हाव भाष दिमाता तथा ममिक्य करता है। वह शांतिमय कैसे रह सकता है। अतएव नट की शक्ति के बाहर होने से शांत रस कोई रस ही नहीं है। परंसु दूसरे लोग रस की अभिव्यक्ति नट में म मामकर सहवयों में मानते हैं, अतएव इस रस के लिये शत या अशांव रहने की अपेक्षा नहीं है। इस पर यह कहा जा सकता है कि वर्शकों में वैराग्य आदि भायों के होने से उनमें शांत रस का आविर्भाव नहीं हो सकता। यदि उनमें इसकी सत्ता मान भी ली जाय, सो उनका माटक देशमा विचार-संगत नहीं जान पड़ता। परंतु यह बात भूलनी न चाहिए कि मनुष्यों में सभी माय संस्कार रूप से विद्यमान रहते है और काध्य या अभिनय-व्यापार द्वारा उनमें से कोई अमिम्यक हो जाता है। नट में शांति या निवेद के न होने से ओ लोग उसमे शांत रस का आविर्भाष नहीं मानते, वे उसमें क्रोधादि के अमाव में रौवादि का आविर्मास कैसे मान सकते है। शिक्षा तथा अभ्यास से यषि मह श्रृंगार रस का अभिनय कर सकता है, तो शांत रस का अभिनय भी उसकी शसि के बाहर नहीं है। यही कारण है कि संगीतरखाकर मैं लिखा है-"जो लोग नाव्य मै आठ ही रखौ को मानते हैं और शांत रस को रसो की कोदि से अलग कर देते हैं, उनको यह समझना २०