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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३३

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साहिस्यालोमा १२ अनुभव कामों की मध्यस्थता से मन को कराया जा सकता है। उसके द्वारा तलवारों की मनकार, पत्तियों की खस्नड़ाहट, पक्षियों का कलवर, हमारे कर्णकुहरी में पहुँचाया जा सकता है। परंतु यदि कोई चाहे कि वायु का प्रचंड बैग, बिजली की चमक, मेघों की गड़गड़ाहर तथा समुद्र की लहरों के आघात भो हम स्पष्ट वेख या सुसफर उन्हें पहचान ले लो यह बात संगीत-कला की सीमा के बाहर है । संगीत का उद्देश्य हमारी आत्मा को प्रभा- वित करना है और इसमें यह कला इतनी सफल हुई है जितनी कान्य-कला को छोड़कर, और कोई कला नहीं हुई। संगीन हमारे मन को अपने इच्छानुसार पंचल कर सकता है, और उसमें विशेष मावों का उत्पादन कर सकता है । इस विचार से यह कला याम्नु, मूर्ति और चित्रकला से बढ़कर है। एक चाप्त यहाँ और जान लेना अत्यंत आवश्यक है। यह यह कि संगीत-कला और काव्य-कला में परस्पर बड़ा अनिष्ट संबंध है। उनमें अन्योन्याश्रय-भाव है। एकाकी होने से दोनों का प्रभाव बहुत कुछ कम हो जाता है। ललित कलाओं में सब से ऊंया स्थान काव्य-कला का है। इसका आधार कोई मत पदार्थ नहीं होता। यह शान्दिक संकेतों के आधार पर अपना अस्तित्व प्रदर्शित करती है। मन को सका शान चनुरिट्रिय या करपैट्रिय द्वारा होता है। मस्तिष्क तक अपना प्रभाष पहुँचाने में इस का के लिये किसी दूसरे साधम के अवलंधन की आवश्यकता कान्य-कल्य