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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३३०

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भाष रसौका मिलन सति उसमें संचरण करते हैं, उनको संघारी या व्यमिवारी भाष कहते हैं।" स्थायी भाषों की भाँति पह रस- म्यभिचारी सिद्धि तक स्थिर नही रहले बाहिक आपस संचलवा- पूर्वक सब रसों में संचरित होते रहते हैं। हमारे मम के भाव आपस में एक दूसरे से ऐसे मिले रहते हैं कि उनकी अलग अलग करके उनको सीमा निर्धारित करनर कछिन ही नहीं, एक प्रकार से असंभव है। हमारा मानसिक जोबन बड़ा ही जटिल है। एक भाष के साथ ही दूसरे अनेक भायों का उत्रय होता है। वे आपस में मिश्रित रहते हैं, अकेले उद्त नहीं हो सकते । इन संचारी भावों में एक विशेष- ता यह है कि वे सदा संचारी या सहायक ही नहीं बने रहते, कभी कभी उनमें से कर एक स्वयं भी स्थायी भाष पन जाते हैं। दूसरे को संवारी भाष पेसे है जो एक ही स्थायी भाव में नहीं बल्कि कई स्थायी भावों में अनुकूल स्थिति पाने पर मिभित हो जाते हैं। मुख्य संचारी भाव ३३ माने गए हैं। कई लोगों का मत है कि वित्तवृधियों को ३३ मावों में विभक्त करना ठीक नहीं है । मात्सर्य, अद्वेग दंभ, ईवी, विवेक, निर्णय, ध्य, समा, वितर्क, उत्कंटा, विनय, संशय, घटसा आदि अनेक भाव जोहन ३३ भाषों में नहीं आ सकते। इस प्रकार सोनभाकों की गिनती का कोई ठिकाना ही नहीं हो सकता। पर यदि काम पखाने का उद्देश्य हो तो अस्या में मात्वर्य, पास मैं उग, अपहित्य में भ, अम में , मति में