साहित्यासोपन ११२ भनुरूप शरीर की सिप्न मित्र क्रियाएँ और मुख की बेनाएं उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार का मनोविकार उत्पन्न धुमा हो, अथषा अभिनय में भाव मारा जिन मनोविकारों को प्रदर्शित करना हो, उन्हीं के अनुकूल मानसिक अवस्था को मानसिक अनुभाष कहते हैं। कायिक तथा मानसिक अनुभाषों के अंतर्गत बारह हाप माने गए हैं। वेष-भूषा से अभिनय में जो भाष प्रदर्शित किये जाते हैं, उन्हें आचार्य अनुभाष कहते हैं। शरीर के सहज मंग-विकार, अद्यया सजीव शरीर धर्म से उत्पन होनेवाले स्वाभाविक अंगधिकारों को सात्यिक अनुभाष कहते हैं। ये प्राठ माने गए हैं। हमारा उद्देश्य रसों पर कोई निबंध लिखना नहीं था; अतपय हमने मुख्य बातों का संक्षेप में वर्णम कर किया है और उस पर यथास्थान अपने विचार भी दे दिए हैं। हमारी भारतीय कविता को समझना और उसका रसास्वादन करना रसों का पूरा पूरा बान प्राप्त किये विना नहीं हो सकता । सब देशों में काव्य का प्रधान आधार मनोवेग या माचे माने गए हैं। उन्हीं भायो या मनोयेगो को लेकर हमारे यहाँ यहा सूचम विधे- सन किया गया है और उस रस का नाम देकर काव्य कर सर्वस्थ मान लिया है। पात एक ही है, योवल उसके विषेचन का ढंग अलग अलग है। अब हम काव्य के एक और तथ्य "शैली" का विषेचन करके इस विषय समाप्त करते हैं।
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