नवाँ अध्याय शैली का विवेचन हम पिछले अध्याय में काथ्य के तीन तत्वो का धिमेचन कर चुके हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि उसमें एक बौधा तत्व मानना आवश्यक है। उनका कहभाकिकषि या क्षेत्रका की सामनो चाहे कैसी ही उत्तम क्यों न हो और उसके भाव, विचार और कल्पनाएँ चाहे कितनी ही परिषक और अद्भुत क्यो म हो, जब तक उसकी कृति में अप-सौदर्य नहीं पायेगा, जर नक वह अपनी सामग्री को पेसा रूप नवे सकेगा जो अनुक्रम, सौष्ठच और प्रभावोत्पादकता के सिद्धांतों के अबुकूल हो, तब नक उसकी कृति काय्य न कहला सकेगी। अतएव चीया नश्य अर्थात् रचना-चमत्कार भी निवान आवश्यक है। रममा चमत्कार का दूसरा नाम शैली है। किसी कवि मा लेखक की शब्द-योजना,वाक्यांशो का प्रयोग, वाक्यो को बनावट और उनकी ध्वनि आदि का नाम ही शैली है। हम पहले मिल चुके हैं कि किसी किसी के मत से शैमी विचारों का परिधान है। पर यह ठीक नहीं क्योंकि परिधान का शरीर से अकग और निज का अस्तित्व होता है, उनकी उस पति से मित्र स्थिति होती है। जैसे मनुष्य से विचार आला शैष्टी का रूप
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