३१. शैकी पप विवेचन कृति में अप्रसर होकर प्रधान स्थान प्रहण करने के लिये उत्सुक हो रहे हैं। पर रख दौड़ में श्रन पीछे रह जाते हैं और भाव आगे निकल जाते हैं। एक ही भाष के लिये अनेक शब्द मिलने लगते हैं और लेखक या कषि उपयुक्त शब्दों को प्रहण करने, सूक्ष्म से सूक्ष्म भायों को प्रदर्शित करने और थोड़े में बड़ी बड़ी गंभीर और भाषपूर्ण याते कहने में समर्थ होता । अतर भारंभिक अवस्था में प्रायः शहाबर ही अधिक देश्न पड़ता है। उस समय लेखक को अपने भाष स्पष्ट करने के लिये अनेक शब्दों को होज खोज कर लाना और सजाना पड़ता है। इससे प्रायः स्वाभाविकता की कमी हो जाती है और शम्दों की छटा में भी वैसी मनोहरसा नहीं देख पड़ती। पक ही बात अनेक प्रकार के शम्दो और याश्यों में शुमा फिराकर कहनी पड़ती है। पर प्रौढ़ावस्था में ये सब बाते नहीं रह जाती । यहाँ तो एक शब्द के भी घटाने बढ़ाने की जगह नहीं रहती। जो सेसक या कवि विद्याज्यसनी नहीं होने, जिन्हें अपने विचारों को प्रौढ़ करने का अवसर नहीं मिटता, या जिनकी उस ओर प्रवृत्ति नहीं होती, उनमें यह बोष अंत तक वर्तमान रहता है और उनकी कृति बाग्माल्य से भरी रहती है। इसलिये लेतकी या कवियों को शब्दों के चुनाव पर गात ध्यान देना चाहिए । उपयुक्त शब्दों का प्रयोग सब से आवश्यक बात है, और यह गुण प्रतिपादित करने में उन्हें वसचिस रहना चाहिए । इस कार्य में स्मरण-शकि यात
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