१३ कला का विवेचन नहीं होती। कानो या आँखों को शब्दों का हान सहज ही हो जाता है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि जोधन की घटमाओं कौर प्रकृति के बाहरी दृश्यों के जो काल्पनिक रूप इंत्रियों द्वारा मस्तिष्क या मन पर अंकित होते हैं, वे केवल भाव- मय होते हैं। और उन भायों के घोतक कुछ सांकेतिक शब्द हैं। अतपय भाव या मानसिक चित्र ही यह सामग्री है, जिसके द्वारा काव्य-कला-विशारद दूसरे के मन से अपना संबंध स्था- पित करता है। इस संबंध स्थापना की चादक या सहायक भाषा है जिसका कवि उपयोग करता है।kar अपने को छोड़कर अथवा अपने से भिन्न संसार में जितने वास्तविक पदार्थ आदि है, उनका विचार हम दो प्रकार से करते हैं। अर्थात् हम अपनी जानत अवस्था में सिन-कहा समस्त सांसारिक पदार्थों का अनुभव दो प्रकार का ज्ञान से प्राप्त करते -एक तोत्राद्रियों द्वारा उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति से और दूसरे उन भावचित्रों द्वारा जो हमारे मस्तिष्क या मन सक सदा पहुँचते रहते हैं । मैं अपने बगीचे के बरामदे में बैठा हूँ। उस समय जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है, उस स्थान का, पेड़ों का, फूलों का, फलो का, अर्थात् मेरे. रपि-पश्च में जो कुछ आता है उन सब का, मुझे साशत् अनुभव या ज्ञान होता है। कल्पना कीजिए कि इसी बीच में मेरा ध्यान किसी और सुंदर बगीचे की ओर चला गया जिसे मैंने कुछ दिन पहले कहीं वसा था अथवा जिसकी कल्पना मैंने अपने मन में
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