साहित्यालोचन १४ ही कर ली । उस दशा में इन बगीचों में मेरे पूर्व अनुभवों या उनसे जनित भाषौ का संमिश्रण रहेगा। अतएव पहले प्रकार के मान को हम वाय भान कटैगे, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष संबंध उन सब पदाधी या जीवों से है जो मेरे, अतिरिक्त घर्तमान हैं और जिनका प्रत्यक्ष अनुभव मुझे अपनी ज्ञानेंद्रियों द्वारा होता है। दूसरे प्रकार के बान को हम आंतरिक शान कहेंगे, क्योंकि उसका संबंध मेरे पूर्व संचित अनुभवों या मेरी कल्पना शक्ति से है। ज्ञान का पहला विस्तार मेरी गोवर-शक्ति की सीमा से परिमित है, पर दूसरा विस्तार उससे अत्यंत अधिक है। उसकी सीमा मिधारित करना कठिन है। यह मेरे पूर्व अनुभव हो पर अवलंबित नहीं, इसमें दूसरे लोगों का अनुभव भी सम्मिलित है। इसमें मेरी ही कल्पना शक्ति सहायक नहीं होती, दसरों की कल्पना शक्ति मी सहायक होती है। जिन पूर्ववनी लोगों ने अपने अपने अनुभव अंकित करके । उन्हें रचित या नियंत्रित कर दिया है, बाद से इमारत के रूप में हो, चाहे मूर्ति के, चाहे चित्र के और, चाहे पुस्तकों के, सच से सहायता प्राप्त करके मैं अपने मान की वृद्धि कर सकता है। पुस्तकों द्वारा दूसरों का जो संचित झान मुझे. प्राप्त होता है और जो अधिक काल तक भानव हृदय पर अपना प्रभाव जमार रहता है, उसी की गणना हम काव्य या साहित्य में करते हैं। साहित्य से हमारा अभिप्राय उस शान-समुदाय से है जिसे साहिन्य-शात्रियों ने साहित्व को स्रोमा के भीतर माना है।
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