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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३५०

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३२५ शैष्ठी का निवेश्य वह यह दे कि 'मुझे आज हो जान पड़ा कि मेरा मुँह दर्पण है तो इससे वह भाष निकला कि नुमने अपने मुँर का मेरे दर्पण-रूपो मुँह में प्रतिबिंब देखकर शउता की झलक देख खीर इससे वास्तष में तुमने अपनी ही प्रतिच्छाया देखी है अर्थात् तुम्ही राठ हो, मैं नहीं। इसके भी अमेक भेद और उपमेव माने गए हैं। हमारे शानियों ने यह निश्चय किया है कि सर्वोत्तम पाश्य यही है जिसने पंग्या रहता है। क्योंकि सबसे अधिक प. मत्कार इसी के शरा आ सकता है। पश्चिमी विद्वानो ने व्यंग्य को एक प्रकार का अलंकार माना है और हमारे यहाँ सोरसके अनेक भेव तथा उपमेद करके इस अलंकार का बड़ा विस्तार किया गया है। सारांश यही है कि हमारे यहाँ शब्द को शधियों का विवरण देकर पहले उनको वाक्यो में पिरोक्ता वरपर करने वाला माना और फिर अलंकारों में उनकी गणना करके उन्हे रसों का उत्कर्ष बढ़ानेवाले कहा है। हमारे यहाँ काम्पो के अनेक गुण भी माने गए हैं और उन्हें "मान रस का उत्कर्ष बढ़ानेवाले रसधर्म" कहा है। फाल्यो में रसो को प्रधानता होने और उनहीं के आधार पर समस्त साहित्यिक सृदि रबका होने के कारण सब बातों में रस का संबंध हो जाता है। पर वास्तव में ये गुण शब्दों से और उनके कारा पाक्यों से संबंध रखते हैं। यो तो हमारे शानियों ने अपनी विस्तार-प्रियता और घेणो-विभाग की कुशवता के कारण को गुण माने है, पर