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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३५२

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हमारे पथ पर अमरेजी भाषा की गय शैली का बहुत अधिक प्रभाव पड़ रहा है और यह एक प्रकार से अनिवार्य मोहै। इसी कारण हमने पहले अंगरेजी सिद्धांतों के अनुकल शब्दों और पाफ्यों के संबंध में विचार किया है और फिर अपने भारतीय सिमासों का उल्लेख किया है। गुणों के संबंध में एक और बात का निर्देश कर देना आवश्यक है। रसों की प्रधानता के कारण हमारे शासियों ने यह भी बताया है कि माधुर्य गुण भंगार, करुण और शांत रस को, ओज गुण धार, बीमस और रोद्र रस को और प्रसाद गुण सब रसों को विशेष प्रकार से परिपुष्ट करता है। पर विशेष विशेष मसंगों के उपस्थित होने पर इनमें कुछ परिवर्तन मो हो जाता है। जैसे श्रृंगार रस का पोषक माधुर्य गुण माना गया है। पर यदि नायक धीरोदारा या निशाचर हो, अयया अवस्था विशेष में अध या उसेधित हो गया हो, तो उसके कयन या मारम में मोज गुण होना आषश्यक और आनंदायक होगा। इसी प्रकार रौद्र, वीर आदि रसों की परिपुष्टि के लिये गौड़ी रीति का अनुसरण चांदनीय कहा गया है. पर अभिनय में बड़े बड़े सभासों को चाक्यरचना से दर्शको में अनि तपास होने की बहुत संभा- वना है। जिस बात के समझने में उन्हें कठिनता होगी, उससे चमत्कृत होकर अष्टौकिक आनंद का प्राप्त करना उनके लिये कटिमदीना, एक प्रकार से असंभव हो आयमा । ऐसे अव- सरों पर नियत सिति के प्रतिक बना करना कोई दोष