शैली का विवेचन अब समान पवार्य इमारापान जार्वित करते है, तब तमकी समानता का भाप हमारे मन पर अंकित हो जाता है। इसी प्रकार अब हम एदार्थों में घिमेद देखते हैं, तब उनका पारस्प- रिक विरोष या अपेक्षता हमारे मन पर.जम आती है। जब हम एक पदार्थ को दूसरे के अनंतर और दूसरे को तीसरे के अनतर देखते हैं, अथवा दो का अभ्युदय एक साथ देखते हैं, तब हमारी मानसिक शक्ति बिना किसी प्रकार के पतिकम के हमारे मस्तिष्क पर अपनी छाप अमाती आती है और काम पड़ने पर स्मरण शक्ति की सहायता से हम उन्हें पुनः यथारूप उपस्थित करने में असमर्थ होते है अथवा जब दो पदार्थ एक दूसरे के अनंतर हमारे ग्राम में अवस्थित होते हैं या जय उनमें से एक ही पदार्थ कमी समता और कभी विरोध का भाष व्यक्त करता है, तब हम अपने मन में उसका संबंध स्थापित करते है और एक का स्मरण होते ही दूसरा आपसे आप हमारे ज्यान में सा जाता है। इसे ही साखिभ्य या तट- स्थता कहते हैं। हमारे यहाँ अलंकारों की संख्या का ठिकाना नहीं है। जाहे श्रेणीवश करने का भी कोई उद्योग नहीं किया गया है। इससे बिना आधार के बलने के कारण उनकी संख्या में उसरो- स्तर वृद्धि होती जाती है। यहाँ इस बात का ध्यान दिला देमा मावाश्यक है कि अलंकार यथार्थ में वर्सन करने की एक शैली है, वर्सन का विषय नहीं है । अतएव वर्णित विषयों के भाधार
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