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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३५७

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साहित्खालोमा पर मसंकारों की रचना करके उनकी संख्या रहामा उचित मही है। स्वभायोति और उनात अलंकारों का संबंध पणित विषय से होने के कारण इनकी गणना अलंकारों में नहीं होनी चाहिए । हमारे यहाँ कुछ लोगों ने अलंकारों की संख्या घटाकर ६१ भी मानी है। पर इनमें भी एक अलंकार के अनेक भेद तथा उपभेद आ मिले हैं। साम्य, बिरोध और सानिध्य या तट- स्थता के विचार से हम इन अलंकारों को तीन गियां बना सकते हैं और अनमै के उपभेदों को घटाकर, अलंकारों की संख्या नियत कर सकते हैं। अब हमको केयर पद-विन्यास के संबंध में कुछ विचार करना है। पदी से हमारा तात्पर्य याफ्यों के समूहों से है। किसी विषय पर कोई अंध लिखने का विचार पद-विन्यारा करते ही पहले उसके मुख्य मुख्य विभाग कर लिए जाते है, सो आगे चलकर परिच्छेदों या अध्यायों के रूप में भकर होते हैं। एक एक अवाय में मुख्य विषय के प्रधान प्रधान भेशों का प्रतिपादन किया जाता है। इस संबंध में श्याम रखने की बात इतनी ही है कि परिच्छेदों का निश्चय इस प्रकार से किया जाय कि मुख्य विषय की प्रधान प्रधान पाते एक एक परिच्छेष में आ जाय उनकी आवृत्ति करने को अवश्यकना न पड़े ओर न वे एक दूसरे को अतिव्याप्त करें। पेसा कर सोने से सब परिच्छेद एक दूसरे मे संशान पग और प्रतिपादित विषय को हृदयंगम करने में मुगम-