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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३५९

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गुम साहित्यारोवन शब्दो, वायी और पदों का चिनेचन समाप्त करके हम शैली के गुणो या विशेषताओं के संबंध में कुछ विचार करना चाहते हैं। हम वाक्यों के संबंध में विवेचन करते हुए यौसी तीन गुणों, माधुर्य, ओज और प्रसाद का उम्मेब कर चुके हैं। तया शम्दी, वाक्यों और पदों के संबंध में भी उनकी मुख्य मुख्य विशेषताएँ बता चुके है । पाचात्य विद्वानो ने शैली के गुणों को दो भागों में विभक्त किया है-एक प्रजात्मक और दूसरा गगात्मक । प्रक्षात्मक गुणों में उन्होंने प्रसाद ओर स्पar को और गगात्मक में शक्ति, करुण और सास्य को गिनाया है। इनके अतिरिक्त लालित्य के विचार स माधुर्य, सस्थरता और कलात्मक विषेचन को भी बौखो की विशेषताओं में स्थान दिया है। शैली के गुणों का यह विभाजन घेनानिक गति पर किया हुआ नहीं जान पड़ता। हमारे यहाँ के माधुर्व, भोज ओर प्रसाद ये तीनो गुमा अधिक संगत, ज्यापक और मुव्यवस्थित जान पड़ते है । हमारे यहाँ आचार्यों ने इन गुणों और शब्दार्थालंकारों को रसा का परिपोषक तथा उत्कर्षसाधक मानकर रस विभाग को सर्वथा संगत, व्यवस्थित और वैज्ञानिक बना दिया है। अतएव हमारे यहाँ काय्य को अनरान्मा के अंतर्गत भावों को मुख्य स्थान पंचकर ग्सा को जो उसका मूल आधार बना दिया है. उससे इस विषय की विधेखना यड़ी ही कुछगस्थित और सुंदर हो गई है। इन गुणों के विषय में हम पहले ही विशेष रूप से लिख चुकं । 1