वृष शैकी का विवेचन अतएष यहाँ उसके स्वरण की आवश्यकता नहीं है। शैली के संबंध में हमें अब केवल एक बात की ओर ध्यान दिखाने की आवश्यकता रह गई है। कपिता के विषेचर में गन और पद्य के संबंध में विचार करते हुए हम इस बात पर जोर दे चुके हैं कि गद्य और पद्य का मुख्य भेव पच पर निर्भर रहना है। काव्य-कला और संगोत-कला के पारस्परिक संबंध का भी हम उल्लेख कर चुके हैं। इस संबंध को सुरत और स्पष्ट करने के लिये ही कविता में दृश्त की आवश्यकता होती है। सच यान तो यह है कि ईश्वर की समस्त सृष्टि, प्रकृति का समस्त साम्राज्य संगीतमय है। हम जिधर आँस उठाकर देखतं और कान लगाकर मुगले है, उधर ही हमें सौदर्य और संगीत ए देस और सुम पढ़ता है। जब हम यह समझ चुके है कि कथिता समस्न दृष्टि से हमाग रागात्मक संबंध स्थापित करसी ओर उस मुरद वनाए रहती है, तब इस यात का प्रति- पावन करने की विशेष आवश्यकता नहीं रह गई कि संगीत उम्म कषिना को कितना मधुर, कोमल, मनोमोहक और आपकारी बना देता है। इसो दष्टि से हमारे आचार्यों ने कविता के इस अंग पर विशेष विचार किया है और इसका अपश्यकता से अधिक विस्तार भी किया है। संगीत कला का आधार मुर और सय है। अतपय काव्य में सुर और लय उत्पन्न करने सधा भिन्न भिन्न सुरों और लयों में परस्पर मित्रता का संबंध स्थापित करने के लिये हमारे यहाँ विशेष रूप से
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