शैखी का विवेचन संस्कृत या विदेशी शब्दों का कहाँ तक प्रयोग करते हैं। माना शब्दो की व्युत्पति ही सबसे महत्व की बात है। जब दो जातियों का सम्मिलन होता है, तब उनमें परस्पर भाचो, विचारो तथा शब्दो का विनिमय होता हो है। यही नहीं, बल्कि एक जाति की प्रकृति, रहन-सहन, सगुणों तथा दुर्गुणों तक का भी दूसरी जाति पर प्रभाव पड़ता है। वे इन सातों से खरस्त्र उद्योग करने पर भी पच नहीं सकती। जब यह अटल नियम सब अवस्थाओं में लग सकता है, निरंसर हगता आया है और लगता रहेगा, लघ रस पर इसना आगा पीछा करने की क्या आवश्यकता है? इस संबंध में जो कुछ विचार करने सथा ध्यान में रखने की बात है, यह यही है कि जब हम विदेशी भात्री के साथ विवेशी शब्दों का अहण करें, तो उन्हें ऐसा धमा लें कि उनमें से घिदेशोएन निकल जाय और वे हमारे अपने होकर हमारे व्याकरण के नियमों से अनुशासित हो । अब नक उनके पूर्ष उभारण को जीवित रखकर, हम उनके पूर्व कप- रंग, आकार-प्रकार को स्थायी बनाए रहेगे, तब तक ये हमार अपने न होंगे और हमे उनका स्वीकार करने में सदा खटक नथा अइसन रहेंगी। हमारे लिये यह आवश्यक है कि हम उन्हें अपने शब्दकुल में पूर्णतया सम्मिलित करके बिलकुल अपना बना ले। हमारी शक्ति, हमारी भाषा की शक्ति इसी में है कि हम उन्हें अपने रंग में रंग कर. पेसा अपनर लें कि फिर उनमें विवेशीपन की झलक भी न रह जाय। यह हमारे लिये कोई
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