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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३६३

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साहित्याखोचन २४२ गया काम नहीं होगा। बहुत वर्षों से नहीं, अनेक शताब्दियों से हम इस प्रकार की विजय करते आए हैं और अब हमें इसमें हिचकिचाने की आवश्यकता नहीं है। दूसरी बात, जिस पर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं, यह भ्रमात्मक विश्वास है कि शैली की कठिनता या सरलता शब्दों के प्रयोग पर निर्भर रहती है। भाषा की कठिनता या सरलसा केयल शनों की तत्समता या तगापता पर निर्भर नहीं रहनी । विचारों की गहना. पिवय-प्रतिपादन की गंभीरता, मुदायिरों की प्रचुरता, आनुषंगिक प्रयोगों की योजना ओर वाक्यों की जटिलता किसी भारा को कठिन नया रस विप. गेन गुणों की स्थिति ही उसे सरल बनानी है। रचना-शैली में यह थान सदा ध्यान में रखना आवश्यक है।