२४५ साहित्य की आलोचना है और उसे अपना कोई मत प्रकट नहीं करना चाहिए, क्योंकि उस मत का वूसरों पर प्रभाव पड़ता है जिससे आगे चलकर आलोचना के काम में वाधा पड़ती है। पर यह माम उतना ठीक नहीं जान पड़ता। प्रत्येक व्यक्ति किसी ग्रंथ के विषय में, उसकी आलोचना करने के साथ ही साथ अपना मत भी प्रकट कर सकता है और उसके उस मत से लोग लाभ भी उठा सकते है। यदि हम थोड़ी देर के लिये यह भी मान ले कि अरलोचक को अपना मत प्रकट करने का कोई अधिकार नहीं है, तो भी यह प्रश्न उठता है कि व्याख्याता के रूप में आलोचक का क्या मत है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय सा ज्ञान पडेगा कि श्याख्या का काम भी बहुत बड़ा और नेढ़ा है। किसी गंध की व्याख्या करने के लिये आलोचक का पूरा पूरा अध्ययन करना पड़ेगा: उसे ग्रंथ के ऊपरी गुणों और वोपों को छोड़कर भीतरी भाचों तक पहुँचना पड़ेगा और यह देखना पड़ेगा कि उसमें कौन सी धात साधारण और क्षणिक है और कौन सी बाते विशेषता- युक्त और स्थायी है तथा उसे इस शत का पता लगाना पड़ेगा कि उसमें कता या नीति आदि के कोन कोन से लिशंत आदि है। उस ग्रंथ में ओ गुगा हिगे हुए होंगे, उनको यह प्रकाशित करेगा और उसमें इधर उधर बिखरे हुए तस्यों को एकत्र करके उन पर विचार करेगा। इस प्रकार यह हमें मन- लायेगा कि विषय, भाय और कला आदि की तुटो से वह मंच कैसा है। इस दशा में उस ग्रंथ के गुण या दोष लोगों
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