३४९ साहित्य की आलोचमा मै राम-लेष का भाव रखकर जो आलोचना की जाती है, उसका विमानों में कोई आदर नहीं होता । यदि ध्यानपूर्वक देवा जाय तो ऐसी आलोचना कोई आलोचना ही नहीं होती। यहाँ हम संक्षेप में यह बतलाना चाहते हैं कि इस प्रदर और सहा. नुभूनि के अतिरिक्त समालोचक मैं और किम किन गुणों को आवश्यकता होती है। सबसे पहले समालोचक को विवान, बुद्धिमान, गुणाही और निष्पन्न होना चाहिए, और जिसमें ये सब गुण न ही. उसको समालोचना के काम से दूर ही रहना भाचा के चाहिए। जिस समालोचक मैं ये सब गुण भाषयक गुण जरेंगे, यह यहुत सहज में आलोख्य ग्रंथ की बातों का मर्म समझ जायगा । आलोचक का मुकर कार्य यह है कि यह आलोच्य अंध को उसके बिलकुल वास्तविक स्वरूप में देखें। किसी जुरे भाव अथरा पक्षपात से प्रेरित होकर वह जो कुछ कहेगा, उसकी गणना निदा अथवा स्तुति में ही घोगो: उसके उस कथन को आलोचना में स्थान न मिलेगा। समालोचक यदि विहान न होगा, तो वह ग्रंथ के गुण , समझ सकेगा यदि वह बुद्धिमान न होगा तो नौर-क्षीर के विवेक में असमर्थ होगा और यदि यह निष्पक्ष न होगा, तो उसका विवेचन निरर्थक और अनाहा होगा। समालोचक के लिये आ- घश्यक विस्ता, बुद्धिमत्ता और गुणमाइकता सो बहुत से लोगों में हो सकती और होती है, पर राग-रूप या पक्षपात से बहुत
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