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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३७२

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साहित्य की आलोचना समझते हैं कि इस पक्षपात या वेष के कारण कभी कभी छोटे मोटे अनर्थ और. अम्याय भी हो जाते हैं। किसी ग्रंथ की पक्षपातपूर्ण समालोचना देखकर बहुत से लोग उन पुस्तकों के पढ़ने में व्यर्थ अपना समय और धन गवा सकते हैं। और पपूर्ण समालोखना के कारण वे किसी अच्छे ग्रंथ से लाभ उठाने से वंचित रह सकते हैं। अतः समालोचक के लिये पंधित और समझदार होने के अतिरिक्त निष्पक्ष होने की भी बहुन बड़ी आवश्यकता होती है। ऐसे समालोचक की समा. लायना से ही साहित्य को भी उति होती है और पाठको कर भी लाभ होता है। समालोचक होने के लिये उपर बतलाए हुए कतिपय मा. निक गुणों की तो आवश्यकता होती ही है, पर साथ हो ग्यमा लायना के लिये एक विशेष प्रकार की बुद्धि या सामर्थ्य की भी आवश्यकता होती है। कभी कभो वेसने में आना है कि अच्छे अबहे पंडित और विद्वाम् उतनी अच्छी समान्दोचना नहीं कर सकने जितनी अच्छी और सटीक समालोचना उनसे कम विधा और योग्यता के लोग करते हैं। एक साधारण दृद्धि- मान पाठक मी कमी कभी किसी ग्रंथ के संबंध में बहुत ही अच्छे हंग से और बहुत ही उपयुक्त सम्मति प्रकट कर सकता है: और उसकी वह सम्मति तथा आलोचना का ढंग देखकर अच्छे अच्छे पंडित चकित हो सकते हैं। इसका कारण कदा- चित् यही होता है कि उसकी सम्मति विचारपूर्ण होने के