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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३७३

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साहित्यालोचन ३५२ अतिरिक राग-द्वेष और पक्षपात आदि से चिलकुल शूग्य होती है। यह ठीक है कि जिस व्यक्ति का काम ही प्रायः अध्ययन और समालोचमा करता है, वह समालोचना के नियमों और रीतियों आदिसे विशेष परिचित होगा और उसका कान-भांडार भो साधारण पाउकों के मान-भांडार की अपका अधिक पूर्ण होगा। पर उसकी आलोचना तभी काम की होगी जब उसमें आलोचना करने की शक्ति पूर्ण रूप से होगी और उसकी आलोचना राग-द्वेय या पक्षपात आदि में मुक्त होगी। करने को तो आलोचना सभी लोग कर खेते है पर आलोचना मी एक प्रकार को कसा है और उसके लिये एक विशेष प्रकार की योग्यता तथा शिक्षा की आवश्यकता होती है। साय ही उसे अपने सम तथा विचारों पर भी अधिकार होना चाहिए। यदि उसमें इन चानों का अभाव होगा, तो वह न तो ठीक ठीक ओर न उदारतापूर्वक विचार कर सकेगा। उस दशा में उसकी आलोचना या सम्मति का भी कोई आदर न होगा। अब हम एक दूसरे प्रकार की आस्टोचना के संबंध में, जिसे तुलनात्मक मालोचना कहते हैं, कुछ बातें बतलाना चाहते हैं। किसी एक पुस्तक की आलोचना करते समय कुछ तुलनात्मक भामोपना लोग उसी विषय की और भी एक, दो बा अनेक पुस्तकें अपने सामने रख लेत है: और उन पुस्तकों से नुलना करते हुए ये आलोच्य पुस्तक की आलोचना करतं.