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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/३७६

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साहित्य की आलोचना व्यापी नियम को दवा नहीं सकते कि बाधक तत्व भी प्रकारांकर से साधक ही सिद्ध होते हैं। संसार में सभी जगह हम देखते हैं कि सवा स्वतंत्रता और शासन, व्यक्तित्व और नियम, पुराने और मए तथा लकीर पीटने और नई वात निका- सने में एक प्रकार का विरोथ चलता रहता है। पर फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि शासन कमी स्वतंत्रतर मै मायक होता है अथवा सकोर पीटनेवालों के कारण कोई ना बात नहीं उत्पन्न होने पाती। दोनों पक्षों का प्रमहा सदा कुछ न कु चलता ही रहता है और जिस समय यह हागड़ा बहुत बढ़ जाता है, उसी समय से नए सिरे से विकास और उन्नति होने लगती हैं। जिस समय स्वतंत्रता की मात्रा बढ़ते बढ़ते उच्छुशलता का रूप धारण करने लगती है. उस समय कुछ कठोर शासन को आवश्यकता आ बड़ी होती है और जिस समय शासन की कठोरता, भयंकरता ओर उबंटता बढ़ जाती है, उस समय नए सिरे से स्वतंत्रता को स्थापना होती है। साहित्य सैन में यही दशा नए ग्रंथों की रचना और आलोचना की है। जिस समय लेखक मनमाने ढंग से कलम खलाने लगते हैं और जी मै जो कुछ ऊटपटाँग आता है, सब लिम्स चलते हैं, जैसा कि आजकल हिंदी में हो रहा है, उस समय आलोचक के अंकुश की आवश्यकता होती है। आलोचना का अंकुश खोगों को मनमाने रास्ते पर चलने से रोकता और उन्हें टीक मार्ग पर चलने के लिये बाध्य करता है। कुछ दिनों तक