साहित्य की आलोचना में अपना मत प्रकट करने का पूरा पूरा अधिकार है। साथ ही उसे इस बात को भी स्वतंत्रता कि वह और आलोचना और उपयोगिता लोगों को भी अपने मत से सहमत कराने का उद्योग करे। एक विद्वान् का मत है कि जब किसी अंथ के संबंध में रायर के दो विद्वानों के परस्पर बिरोधी मन होते हैं, उस समय एक की आलोचना और सम्पति का दूसा की आलोचना और सम्मति से आपसे आप खंडन हो जाता है और आलोचमा का उद्देश्य ही सिक नहीं होने पाता क्योकि हमें उस ग्रंथ को उपयोगिता या अनु- फ्योगिना का कुछ भी पता नहीं लगने पाना । इसका कारण प्रायः यही होता है कि ऐसे समालाचक बहुधा न्यायाधीश की भाँति नली, बल्कि वकील या प्रतिनिधि की भाँति अपना काम करते हैं और अपने पक्ष का आवश्यकता से अधिक समर्थन कर चलने है । यदि यह पात न भी हो. तो भी हमें यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि आलोसमा में जो मत प्रकट किया माना है, वह प्रायः आलोचक का व्यक्तिगत और निजी मत होता है। यदि आप को सम्मति में कोई पुस्तक आदर्श और इमारी समझ में बहुन ही साधारण हो, तो यही मामा जायगा कि उस संबंध में आपकी और हमारी सम्मत्ति बिलकुल व्यक्तिगत है। अब यदि कोई तीसरा व्यक्ति बीच में आ पड़े और हममें से किसी के अनुकूल या प्रतिकूल अपना मत प्रकट करं, तो उस समय मानों उस ग्रंथ के संबंध में एक और तीसरी
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