कला का विवेचन और यह पाल शान पर अवलंबित है; परंतु साहित्य में मूर्त आधार का अभाव है और वह अंतर्शन पर अपलंबित है। संक्षेप में, हम चित्र को देखकर यह कहते हैं-"मैम लड़ाई देखी।" पर उसका वर्णन पढ़कर हम कहते हैं- मैंने उस लड़ाई का वर्णन पढ़ लिया।" या उस लड़ाई का ज्ञान प्राप्त कर लिया।" इन विचारों के अनुसार काव्य या साहित्य को हम महा- जनों की भावनाओं, विचारों और कल्पनाओं का एक लिखित भांडार कह सकते हैं, जो अनंत काल से भरता आता है और निरंतर भरता जायगा। मानव सृष्टि के आरंभ से मनुष्य जो देयता, अनुभष करता और सोचता विचारता आया है, उस सबका बहुत कुछ अंश इसमें भरा पड़ा है। अतएव यह स्पध है कि मानव जीवन के लिये यह मांडार कितना प्रयोजनीय है। मनुष्य के काव्य रूपी मानसिक जीवन में पुस्तके बड़े महत्व की वस्तु है। बिना उनके फाग्य का अस्मित ही लम हो गया होता । यदि पुस्तकं च होती तो कान्य-जा में आज हम महर्षि वामीकि, कविकुल-चूड़ा- पुस्तकों का महतर मणि कालिदास, भषभूति, भारधि, भगवान सुखदेव, मर्यादापुरुषोत्तम महाराज रामचंद्र आदि से कैसे बामचीत करते, उनके कौर्ति-कलाप का शान कैसे प्राप्त करते, और कनके अनुभव तथा अनुकरण से लाभ उठाकर अपने ग्रीषन को उरत और महत्वपूर्ण बनाने में कैसे समर्थ होते? संसार का जो कुछ ज्ञान हम अपने पूर्व अनुभव और 1 २
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