साहित्यालोचन २६४ सहि को मित्र कुछ निंदा भी करे तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी सम्मनिपर भी कुछ विचार करें और यह जानने का प्रयोग करे कि उसमें ऐसी सम्मति क्यों और किन अधारों पर वो है। और यदि भली भांति विचार करने के उपरांत भी हमें उसके मस को पुष्टि करमेशकी कोई बात न मिले अथवा बहुत ही कम यात मिते, तो हमें समझ लेना चाहिए कि या तो उसने किसी प्रकार के शेष के कारण और या किसी प्रकार की अमान- ता के कारण थाह सम्मति दी है। आप पूछ सकते हैं कि हमारे इस उदाहरण से क्या सियांत निकन्टा । इससे यह सिद्धांत निकला कि किसी ग्रंथ का महत्व या उपयोगिता आदि किस प्रकार प्रमाणित होती है । इसका तार्य यही है कि किसी ग्रंथ की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता आदि के संबंध में बहुत से शिक्षिती और समझदारी की जा सम्मति हो, वही मण्य होनी चाहिए । और यदि यो संलोग उसके विपरोत आफ्नो सम्मति प्रकट करें, तो पहले हमें उनकी सम्मति पर विचार करना चाहिए, और यदि उनकी सम्मति में हमै कोई तस्व की वात न मिले तो इमे पा सम्मति अग्राह्य समझकर छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि जो अंग अनेक बालोचकों की परीक्षा में ठोक उतरा हो और जिसके संबंध में बहुत कुछ वादविधाद के उपरांत भी लोगो को अनुकूल सम्मनि हो, उसे उत्तम ग्रंथ मानने में हमे कोई आनाकानी न होनो साहिए । सारांश यह है कि बहुत कुछ विकट परीक्षाओं के उपरांत भी जो ग्रंथ अच्छा
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