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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/४३

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२२ साहित्यालोचन अंतर्गत हो सकती है, परंतु समस्त साहित्य काव्य की पदयी पाने का अधिकारी नहीं हो सकता। अब देखना यह कि वे कौन से गुण हैं जिनके कारण साहित्य का एक ग्रंथ "काव्य" कहलाए जाने का अधिकारी होता है और दूसरा उस अधिकार से वंचित रह जाता है। क्या ज्योतिष, गणित, न्याकरण, इतित हास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि के ग्रंथ काश्य में परिगणित हो सकेंगे? यह आवश्यक नहीं है कि जो साहित्य हो, वह काव्य भी हो। साधारण साहिरप में से नुनी चुनो रचनाएँ “काध्य' का गौरव प्राप्त करती हैं। ज्यातिष, गणित, व्याकरण आदि के ग्रंथ "काव्य" की श्रेणी में परिगणित नहीं हो सकते, क्योंकि उनका एक मात्र उद्देश्य ज्ञान का प्रचार करना है। हाँ एक बात अवश्य है,। कुछ कवि या ग्रंथकार ऐसे भी हो गए है जिन्होंने वैयक और ज्योतिष के भो अंधों में काव्य-कला. का पुर के विया है। यह बात उन्होंने शान बूझकर की है। उन्होंने कवित्वपूर्ण सरस रचना इसलिये की है कि लोग उनके पंच चाव से पढ़े, उमसे पढ़नेवालों को अपने विषय की घान-प्राप्ति भी हो और साय ही उनका मनोरंजन भी हो। लोहियराज-कल वैद्यशोवन और वैधावतंस पुस्तके पेसी ही हैं। ये दोनों ही संस्कृत भाषा में हैं। ज्योतिष शास्त्र की भी दो एक पुस्तकें इसी ढंग की है। शास्त्र विशेष विषयक पुस्तके उन्हीं लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर सकती हैं जो वन शास्त्री के सम्वों को जानना चाहते हो। सब के लिये उनमें आकर्षिणी