साहित्यालोचन २८ कठिन ही नहीं किम्नु असंभव है। परंतु प्रधान प्रधान बातों को ध्यान में रखकर इम काव्य के विषयों के पाँच विभाग कर सकते हैं। यथा-(१)किसी व्यक्ति का आत्मानुभव अर्थात किसी के निजी जीवन के बाह्य नथा आन्तरिक अनुमय में आनेवाली पातौ को समष्टि, (२) मनुष्य मात्र का अनुभव सर्थात् जीयन मरण, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, आशा-निराशा, मेम-द्वेष आदि ऐसी महत्वपूर्ण बातें जिनका संबंध किसी एक दी व्यक्ति से न होकर सारे मनुष्य समुदाय से होता है, (३) मनुष्यों का पारस्परिक संबंध भर्यात् सामाजिक जीवन और उसके सुमा-दुःख मादि, (४) दश्यमान प्राकृतिक जगस् और. उससे हमारा संबंध और (५.) मनुश्य द्वारा काव्य और करखा का मादुर्भाव । इस प्रकार मनोवृत्तियों और विषयों के आधार पर हम काम्य-साक्षिय को कर थेणियों में विभक्त कर सकते हैं। इन 1 दोनो आधारी के अनुसार हम ये विभाग कर सकते है-(१) आत्माभिव्यंजन-संबंधी साहित्य, के विभाग अर्थात अपनी पीनी या अपनी अनुभून बातो का वर्णन। आनचितन या आत्मनिवेदन विषयक हृदयाद्गार, ऐसे धारूर, अंथ या प्रचंध जो स्वानुभव के आधार पर लिखे जाये, साहित्थरलोचन और कलाविवंचक रचनाएँ, सयासी विभाग के अंतर्गत हैं। (२) काव्य जिनमे कवि अपने अनुभव की वाले छोड़कर संसार की अन्यान्य बातें, अर्थात् मानव-जोयन कामद .
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