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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/५३

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गहिन्यालीखन ३२ टोगों के सामने रखता है, इसमें यह अपनी ही व्यक्तिगत सत्ता का प्रतिबिंब मालकाता है। जितनी रचनाएँ है, सब अपने रचयिता के मस्तिष्क और हमय से ही उत्पन्न होती हैं। उनका रचयिता उनके प्रत्येक पृष्ठ में अदृश्य रूप से व्याप्त रहता है। उसके प्राण, उसका जीवन, उसका सर्वस्व जिसके कारण उसकी महत्ता है, उनमें सर्चत्र पाया जाता है। अतएव किली अंथ को पूरी तरह से समझने के लिये हमें पहले उसके रचयिता से परिचित होना चाहिए। रचना का महत्व रचयिता के महत्व ही के कारण होता है, क्योंकि रचयिता की प्रतिभा की छाप रबमा में सर्घष दिखाई पड़ती हैं। सचा प्रतिभाशाली लेखक पुराने से पुराने पिएपेपित विषय को भी इस दंगसे अपने पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर सकता है कि उसमै नवीनता और मौलिकता झलकने लगती है। उसमै विचारों को उत्तमता तथा नवीनता के साथ ही विषय-प्रतिपावन की शैली में भी अनौनापन दिखाई देने लगता है। इन्हीं कारणों से ऐसी रचना मन को मुग्ध कर लेती है। पर यह सभी हो सकता है जय ग्रंथकार को उन सब बातों का, जिनके विषय में चढ़ लिख रहा है, स्वयं अनुभव हो, उसने उनको अपने धर्म चहुओं या हदय की आँखो मे वेस्या हो, और उन्हें माश द्वारा प्रकट करने में अपनी प्रतिभा के वह से उन पर क्या प्रकाश डाला हो। रचयिता मैं यह शक्ति भी होनी चाहिए कि वह अपनी भाषा-अपनी शम्न योजना-से हममें