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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/५४

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३३ काव्य का विवेचन मी उन्दी विचारों और भावनाओं की तरंगावक्ति उत्पन्न कर दे, बिनके शवनी होकर उसकी वाणी प्रस्फुटित और लेखमी चंचल हो उठती है। ग्रंथकार के ऐसे ही ग्रंथ वास्सय में "काम्य" पद के अधिकारी हो सकते हैं। वही उसके प्रतिरूप, प्रतिच्छाया या स्वरूप के प्रतिबिंब होते हैं। अतएव किसी अंध पर विचार करना मानों उसके रचयिता पर-उसके साहित्यिक जीवन पर-विचार करना है। परंतु कोई ग्रंथकर्ता बिना वास्तविक अनुभव प्राप्त किए अथवा बिमा मामय-जीयन या जड़-चेतन जगत की सूपम से भी सूक्ष्म बातो को हगत किए किसी विषय पर लिखकर सफलता नहीं प्राप्त कर सकता । अनुभव अथवा अभीए विषय का सर्वांगीण शान प्राप्त कर लेने पर उसे स्वच्छंदता से बिना भन या संकोच के, अपने विचारों को, स्पष्टतापूर्वक ठीक ठीक प्रकट करना चाहिए । जहाँ इस संबंध में कृत्रिमता आई और भाव कुछ के कुछ हो गए, यहाँ ग्रंध स्थायी न होकर इस संसार में कुछ ही दिनों का पाडुना रह जाता है। झुम इस बात को आशा नहीं कर सकते कि प्रत्येक ग्रंथकार में भादों का विकास, विचारों का गांभीर्य तथा अनुभषों का माचुर्य हो; परंशु हम यह आशा अवश्य कर सकते हैं कि उसमें उत्तम से उसम जो गुण है, उसे वह मच्छी तरह हमारे सामने रख दे। इस प्रकार लिने हुए किसी ग्रंथ को जब हम हाथ में लेकर ध्यानपूर्वक उसका अध्ययन प्रारंभ करते हैं, सब मानों उसके ३