सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/५८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

३७ काव्य का विवेचन है। हिंदी के समस्त प्राचीन ग्रंथों का अभी तक प्रकाशन नहीं हुआ। कहना तो यह चाहिए कि अभी बहुत ही थोड़े माचीन ग्रंथों का प्रकाशन हो पाया है। इस अघस्था में पहले तो यह आवश्यक है कि जो ग्रंथ भिसते जायें, वे सब प्रकाशित होते जायें: और किसो कमि या लेखक के जीवन से संबंध रखनेवाली जितनी सामघी मिले, सब संगृहीत कर ली अश्य, जिसमें वह अंथ और यह सामन्नो कान-कनलित होने से बच जाय । इसके अनंतर अनुकूल समय आने पर उनकी जाँच पड़ताल करके महत्वपूर्ण और उपयोगी वस्तुएँ, अनुपयोगी और अनावश्यक वस्तुओं से अलग कर ली जाय । ग्रंथों के अध्ययन में आनुपूर्व अर्थात् समयानुकम प्रणाली का अवलंबन करने में हमें पद पद पर कवि की कृतियों की पारस्परिक समानता या विस्मिता पर विचार नुलनात्मक करना चाहिय, और तदनुसार उसके महत्व प्रणाली और उसकी प्रतिभा को तुलनात्मक कसौटी पर कसना चाहिए । इसके अनंतर हमको उस कवि की तुलना पेसे अन्य कवियों से करनी चाहिए जिन्होंने उसी या उन्हीं विपयों पर लेखनी चलाई हां, एक ही प्रकार की समस्याओं पर विचार किया हो और जो एक ही प्रकार की स्थिति में स्थित रहे हो। अथवा कारण विशेष से जिन्हें हमारा मन एक दूसरे से अलग न कर सकता हो। जैसे, यदि इम तुलसीदास जी पर विचार करना चाहें तो हमारा मन हठात् सूरदास, केशवदास और वज-