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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/६४

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४३ काव्य का विवेचन विशेषता होती है जिससे हम पूर्णतया अभिश होते हैं। चाहे हम उस विशेषता का विश्लेषण करने में समर्थ हो या न हो, पर ससे हम पहचान अवश्य सकते है और अपने मन में दूसरों को आवाज से उसकी विभिश्ता स्थिर कर सकते हैं। वाणी को यह विभिन्नता हमें अपने मित्र या संबंधी की आवाज पहचानने में समर्थ करती है। इसी प्रकार किसी कधि या लेखक की शव योजना, वाक्य-रचना या विचार:व्यंजना का दंग हमें बतला देता. है कि वह कौन है। हमें इन सब बातों में उसका जो व्यक्तित्व दिखाई देता है, उसी से हम कह देते हैं कि यह पद या वाक्य दूसरे का हो ही नहीं सकता। इसी का नाम लखन-शैली या रीति है। एक विद्वान ने रचना-शैली को विचारों का परिच्छर कहा है। पर, यह ठीक नहीं: क्योंकि परिच्छर शरीर से अलग रहता है, यह अपना निज का अस्तित्व रखता है; उसकी स्थिति उस न्यक्ति से भिन्न होती है। जिस प्रकार मनुष्य से उसके विचार अलग नहीं हो सकते, उसी प्रकार विचारों को व्यक्त करने का ढंग भी उनसे अलग नहीं हो सकता। अतएव शैली को विचारों का परिच्छद न कहकर यनि हम उन विचारों का रश्यमान रूप कहें, तो बात कुछ अधिक संगत हो सकती है। भाषा का प्रयोग तो सभी लोग करते हैं, पर प्रतिभावान् की भाषा कुछ निराले दंग की होती है। यह उसके भावों की क्रीन वासी सी होती है और उसे वह अपने विचार प्रकट करने के लिये अपनी इच्छा के अनुसार, अपनी विशेषता के अनुरूप एक विशेष प्रकार के साँचे मै द्वार