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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/६५

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साहित्यालोचन लेता है। उसके भावों, विचारों, मनोवृच्चियों तथा कल्पनाओं का जमघट और अनुक्रम, उपमा, अनुभास आदि अलंकारों का प्रयोग, उसकी सूझ, गंभोरता, निपुणता आदि उवाबनाएँ और मन की तरंगें,जो उसके मस्तिष्क से भाषा का रूप धारण करके प्रकट होती है, उसकी शैली पर विशेषता की छाप लगा देती हैं। भिन्न मिस लेखकों और कवियों कीरनाओं में भिनभिन्न विशेषताएँ होती है। अतएय किसी कवि या अंधकार को आलोचना करते समय उसकी लेखन-शैलो अर्थात् भाव-व्यंजना के ढंग पर भी विचार करना पड़ता है। एक ही अन्धकार की रचनाओं में भी, समय पाकर, शैली बदल जाती है। प्रायः देखा जाता है कि किसी कषि की प्रारंभ की कृतियों में शब्दों का थाहुल्य और भाचों की न्यूनता होती है: मायावस्था में दोनों -शब्द प्रयोग और भाव-प्रायः बराबर हो जाते हैं और उत्सर अवस्था में शवों की कमी और भाषों की अधिकता हो जाती है। प्रारंभ में प्रायः यह देखा जाता है कि कवि अपनी भाग बड़ी सावधानी से सजाता है-थोड़े से भायों को बड़े विस्तार के साथ लिखता है । अर्थात् वह मानाउंबर का अधिक सहारा सेता है। परंतु अन्तिम अवस्था में उसके वाक्य गठे हुए होते हैं। उनमें थोड़ी भी न्यूनाधिकना करने से भाच बदल जाता है। ऐसा जग्न पठता है कि भात्रो और शन्दों की दौड़ में भाव आगे निकल जाते हैं और शव पीले रहे जाते हैं। इससे यह अर्थ न निकालना चाहिए कि उत्तर-कालोन भागमै शिथिलता आ जाती