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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/६७

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तीसरा अध्याय साहित्य का विवेचन पिछले अध्याय में हम यह बतला चुके हैं कि किस प्रकार ग्रंथों के अध्ययन से हम ग्रंथकार की समीक्षा करके उसके मानसिक विकास का वृत्तांत जान साहित्य और सकते हैं। इस अध्याय में हम इस बात का जातीयता मिरूपण करेंगे कि ग्रंथकार के ग्रंथों के आययन से हम उसके देश और उसके देशवासियों का बहुत कुछ समकालीन इतिहास भी जान सकते हैं। किसी साद्वित्व का अध्ययन करते करते हमें इस यात की आवश्यकता प्रतीत होने लगती है कि यदिहमे उस साहित्यका बम प्राप्त इतिहास अवगत हो जाता तो बड़ी बात होती हम उसका और भी अधिक गहरा अध्ययन कर सकते । बात यह है कि साहित्य और असर्फ इति- हास में अन्योन्याश्रय संबंध है। एक के शान के लिये दूसरे का भान भो आवश्यक है । किसी प्रतिमाशाठी ग्रंथकार की स्थिति अपने ही काल और अपने ही व्यक्तित्व से सीमाबद्ध नहीं होती। वह उनसे भी आगे बढ़ जाती है। यहाँ तक कि वह पीछे की भी खवर लेती है। उसका संबंध भूत और भविष्य से भी होता है। समय की माला में कवि या ग्रंथकार वीच की कड़ी के समान