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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/६८

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काष्य का विश्वन होता है। जिस प्रकार श्रृंखला में आगे और पीछे की कड़ियाँ धीच- बाली कड़ियों से संलग्न रहकर वसवला का अस्तित्व बनाय, रहती हैं,उसी प्रकार प्रतिभाशाली ग्रंथकार अपने पूर्ववर्ती ग्रंथकारी का फल-स्वरूप और उसरवर्ती ग्रंथकारों का फूल-रूप होता है। जैसे फूल के अनंतर फल का आगम होता है, पैसे ही ग्रंथकार भी एक का फल और दूसरे का फूश होता है। भूत और भविष्य के इस संबंध-शान की कृपा से हम वर्तमान अन्धकारों की कृतियों के द्वारा उनकं समकालीन तथा पूर्ववर्ती ग्रन्थकारोंक भी पहुँच जाते हैं । अन्त में इस प्रकार चलते चलतेहम उनके आतीय साहित्य तक पहुँच सकते हैं। वहाँ तक पहुँचने पर हम इस चात का अनुभव करने लगते हैं कि वह जातीय साहित्य भी कुछ सत्ता रमाता है और वह सत्ता सजीव सी है। क्योंकि ज्यो ज्यो जीसा जागता पाणी प्राकृतिक नियमों के वशीभूत होकर विकास की भिन्न भिष अवस्थाओं को पार करता हुआ उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता जाता है, त्यो त्यों जातीय साहित्य भी उन्नति करना जाना है । अतएव किसी साहित्य के अध्ययन मैं ऐतिहासिक दृषि से हमै दो बातों पर विचार करना पड़ता है-एक तो उसके परंपरागत औषन पर, अर्थात् उसके जातीय भाय पर; और दूसरे उस जीवन के परिवर्तनशील रूप पर, अर्थात् इस बात पर कि वह जातीय जीवन किस प्रकार भित्र भित्र समयों के भामों को अपने में अन्तर्हित करके उन्है ध्यंजित करता है। अतएव किसी जाति के काव्य-भूसाह या साहित्य के अध्य-